Skip to main content

Nitish Archive

लालू जी को जेल से डर लगता था, लेकिन नीतीश जी को नहीं। यह कहानी उस दौर की है जब बिहार की राजनीति सड़कों और जेल की सलाखों के बीच आकार ले रही थी।

पकड़-पकड़ैया और MISA का दौर

एक बार आंदोलन के दौरान लालू जी और नीतीश जी दोनों गया ज़िले में एक छात्र सभा को सम्बोधित कर रहे थे। पुलिस उन्हें पकड़ने आई, तो दोनों ने पुलिस के साथ लंबी दौड़ लगाई, दीवारें फाँदीं और बच निकले।

जब MISA के तहत लालू जी को गिरफ़्तार किया गया, तो वह कुछ ही दिनों बाद बीमारी का बहाना बनाकर पटना मेडिकल कॉलेज में भर्ती हो गए। वहाँ उन्होंने डॉक्टरों और नर्सों से दोस्ती कर ली और लंबे समय तक अस्पताल के गार्ड के कमरे में टिके रहे।

पिता की विरासत और आपातकाल

नीतीश जी के जीवन में जेल जाना एक पारिवारिक विरासत की तरह था। उनके पिताजी भी दो बार जेल गए थे और नीतीश जी भी दो बार जेल गए: एक बार MISA में और एक बार आपातकाल (Emergency) के दौरान।

हालाँकि, नीतीश जी को गिरफ़्तार करना इतना आसान नहीं था। वह बिहार से जेल जाने वाले आख़िरी कुछ लोगों में से थे, जिनमें कर्पूरी ठाकुर भी शामिल थे।

भूमिगत जीवन और गिरफ़्तारी

आपातकाल से पहले नीतीश जी कई बार राजा बाज़ार में अपनी बड़ी बहन उषा के घर छिपे थे। लेकिन आपातकाल के दौरान वह न तो बहन के घर गए और न ही अपने दोस्त नरेंद्र के हॉस्टल रूम में। जिनसे भी मिलना होता था, नरेंद्र जी के मार्फ़त ही होता था। पूरे आपातकाल के दौरान नीतीश जी अपनी पत्नी से सिर्फ़ दो या तीन बार मिले होंगे।

९ जून १९७६: वह दिन जब बच्चा चूक गया भोजपुर के डूबौली गाँव में एक बच्चे को ऊँचे मचान पर बैठाया गया था ताकि पुलिस के आते ही वह सूचना दे दे। लेकिन बच्चे की माँ ने उसे किसी काम के लिए बुला लिया, और ठीक उसी समय पुलिस आ गई। नीतीश जी गिरफ़्तार हो गए। उन्हें आरा पुलिस स्टेशन और फिर बक्सर सेंट्रल जेल ले जाया गया।

सलाखों के पीछे का हौसला

जब पत्नी मंजू, मित्र नरेंद्र, बहन उषा और जीजा जी देवेंद्र सिंह उनसे मिलने पहुँचे, तो नीतीश जी ने मुस्कुराते हुए कहा:

“मैं यहाँ लम्बे समय के लिए नहीं हूँ, बहुत जल्दी सरकार का ये तानाशाही दौर ख़त्म होगा।”

मंजू जी ने उत्तर दिया कि वह सुबह-शाम भगवान से प्रार्थना करेंगी कि आंदोलन को जल्द सफलता मिले। मार्च १९७७ में आपातकाल ख़त्म होने तक नीतीश जी जेल में ही रहे।

ससुराल में एक रात की ‘कैद’

एक बार उन्हें बक्सर जेल से भागलपुर जेल शिफ़्ट किया जा रहा था। बक्सर से पटना पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई और भागलपुर जाने वाली आख़िरी ट्रेन छूट गई। नीतीश जी ने साथ चल रहे दो पुलिसकर्मियों से आग्रह किया:

“अगर दिक़्क़त न हो, तो हम मेरे ससुराल (कंकड़बाग) चलकर रात बिता सकते हैं।”

पुलिस वाले जानते थे कि नीतीश कुमार भागने वाले क़ैदी नहीं हैं। वे उनके ससुराल गए, वहाँ बढ़िया खाना खाया, रात बिताई और अगली सुबह सभी भागलपुर जेल के लिए रवाना हो गए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *