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Nitish News

जून 1994 में जब नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस के साथ 14 सांसद अपने आप को जनता दल से अलग करके जनता दल (जॉर्ज) बनाया तो कुछ ही महीने के भीतर यह अफवाह भी फैलने लगा की लालू यादव भी अपनी अलग पार्टी बना सकते हैं. इसी अफवाह के ऊपर प्रेस वार्ता में जनता दल के राष्ट्रिय अध्यक्ष शरद यादव जी ने यहाँ तक बोल दिया कि लालू यादव भी अगर जनता दल छोड़ देंगे तब भी जनता दल के सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से पहली बार नीतीश कुमार वर्ष 1989 में सांसद बने थे और 1989 से ही बाढ़ को पृथक जिला बनाने की मांग हो रही थी। 1989 से 1999 तक लगातार 5 बार नीतीश कुमार बाढ़ लोकसभा से संसद रहे लेकिन बढ़ कभी पृथक जिला नहीं बन पाया। आपका क्या मत है बात अलग जिला क्यों नहीं बन पाया जबकि इसी दौरान लखीसराय और शेखपुरा जैसा छोटा क्षेत्र पृथक जिला बन गया।

ऐतिहासिक चित्र: 1991 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार का समर्थन करने के लिए दुलारचंद से आग्रह करने के लिए मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव खुद चलकर दुलारचंद के घर गए थे. यह चित्र उसी सभा की है जिसमे दुलारचंद ने नीतीश कुमार को अपना समर्थन देने के प्रतिक के रूप में उन्हें पगड़ी पहनाया था जबकि बगल में लालू यादव बैठे हैं. क्या आप बता सकते हैं यह तस्वीर किस तिथि की है और किस स्थान का है ?

अगर 1989 के लोकसभा चुनाव में शेर ए बिहार के नाम से मशहूर रामलखन सिंह यादव बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीत जाते तो क्या लालू यादव दो साल बाद बिहार के मुख्यमंत्री बन पाते? क्योंकि 1989 तक रामलखन यादव लालू यादव से कहीं अधिक बड़े नेता था। अगर नीतीश कुमार वो चुनाव हार जाते रामलखन यादव से तो क्या नीतीश कुमार का राजनीतिक कद उतना बड़ा हो पाता ?

1996 के लोकसभा चुनाव के दौरान लालू यादव पूरा चुनाव यह बोलकर प्रचार कर रहे थे कि अगर बिहार के लोगों ने लालू यादव और उनकी पार्टी का साथ दिया तो देश को पहला बिहारी प्रधानमंत्री मिलेगा. लालू यादव अपने आप को देश का अगला प्रधानमंत्री बनने का दावा कर रहे थे. दूसरी तरफ नीतीश कुमार लालू यादव के इस दावे को मुंगेरी लाल के हसीन सपने बता रहे थे. इस चुनाव में लालू यादव की पार्टी को आशा के अनुरूप परिणाम नहीं मिला और बिहार के 54 सीटों में से मात्र 22 पर सफलता मिली और लालू यादव का प्रधानमंत्री बनने का सपना टूट गया.

“नीतीश कुमार अमर रहे” दिन था 19 अप्रैल 1996, स्थान था मसौढ़ी का गाँधी मैदान (पटना वाला गाँधी मैदान नहीं), और कार्यक्रम था लोकसभा चुनावी रैली जिसमे पहली बार बीजेपी और समता पार्टी का गठबंधन हुआ था और दोनों साथ में चुनाव लड़ रहे थे और इसी कारण बीजेपी और समता पार्टी के नेता साथ में प्रचार कर रहे थे. चुनावी सभा के दौरान कई तरह के नारे लग रहे थे और इसी दौरान एक बीजेपी कार्यकर्ता ने नारा लगा दिया “नीतीश कुमार अमर रहे”.

नालंदा से चुनाव लड़ने क्यों आए जॉर्ज साहब ? जॉर्ज साहब का सुरक्षित सीट था मुजफ्फरपुर जहां से वो कभी चुनाव नहीं हारे थे फिर भी वो मुजफ्फरपुर छोड़कर नालंदा क्यों चले आए थे 1996 के लोकसभा चुनाव में ? दूसरी तरफ नालंदा में कम्युनिस्ट का दशकों से राज था और बीजेपी भी कभी भी जितना तो दूर कभी उपविजेता तक नहीं बन पाई थी और समता पार्टी का तो कोई नामोनिशान तक नहीं था। इसके बावजूद जॉर्ज फर्नांडिस क्यों नालंदा चुनाव लड़ने आए?

इस खबर में दो रोचक तथ्य हैं 1= 1991 के इस लोकसभा चुनाव में बाढ़ संसदीय क्षेत्र से नीतीश कुमार के खिलाफ कर्पूरी ठाकुर की पार्टी लोकदल से दुलारचंद यादव चुनावी मैदान में थे। ये वही दुलारचंद यादव हैं जो 2025 के विधानसभा चुनाव में मारे जाते हैं और इसके आरोप में अनंत सिंह के ऊपर केस हुआ है। बाद में लालू यादव दुलारचंद यादव के घर गए और नीतीश कुमार के पक्ष ने सहयोग और अपना नामांकन वापस लेने के लिए सफलतापूर्वक आग्रह किया। बाद में नीतीश कुमार ने अफसोस किया कि उन्हें दुलारचंद यादव से सहयोग नहीं लेना चाहिए था। 2= दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि नीतीश कुमार के पारिवारिक डॉक्टर एस एन आर्या इस चुनाव में बीजेपी की तरफ से प्रत्याशी बनना चाहते थे लेकिन टिकट नहीं मिलने पर स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ताओं ने नीतीश कुमार के पक्ष में समर्थन दे दिया था।

नीतीश कुमार का प्राइवेट आर्मी: लालू यादव की पार्टी जनता दल से अलग होने के बाद जब भी नीतीश कुमार किसी कार्यक्रम में कहीं जाते थे तब उनकी सुरक्षा के लिए कुछ इसी तरह उनके दर्जनों कार्यकर्ता बन्दुक लेकर उनकी सुरक्षा करते थे. आपको क्या लगता है नीतीश कुमार बंदूकों के साथ क्यूँ घूमते थे ? १) क्या नीतीश कुमार अपना दबंगई दिखाने के लिए ऐसा करते थे ? २) या फिर नीतीश कुमार लालू यादव के डर से ऐसा करते थे ? ३) क्या नीतीश कुमार के कार्यकर्ता बिना नीतीश कुमार से पूछे इस तरह बन्दुक लाते थे ? ४) क्या उस दौर में जंगल राज का इतना प्रभाव था कि लोग पुलिस की सुरक्षा पर भरोसा नहीं करते थे ? यह चित्र 21 जुलाई 1994 का है जो 22 जुलाई को हिंदुस्तान अख़बार में छपा था. नीतीश कुमार बिहार शरीफ के कर्पूरी भवन में जनता दल (जॉर्ज) के सांसदों द्वारा आयोजित कार्यकर्ता रैली में भाग लेने गए थे.

30 जुलाई 1994 को नीतीश कुमार बोल रहे थे कि यदि लालू यादव “किसी और यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बना दें तो नीतीश कुमार और उनके समर्थक फिर से जनता दल में वापस आ सकते हैं.” एक महीने के भीतर 30 अगस्त को नीतीश कुमार बयान दे रहे थे कि “लालू एंड कंपनी के साथ कोई समझौता नहीं होगा” वो दौर नीतीश कुमार के लिए संभवतः या तो बहुत असमंजस वाला था या फिर नीतीश कुमार इस तरह के बयान देकर लालू यादव के साथ मजाक किया करते होंगे.

25 जून 1994, नीतीश कुमार, जॉर्ज फर्नांडिस समेत 14 सांसदों द्वारा अपने आप को लालू यादव के जनता दल से अलग करके अपनी नई पार्टी बनाने की घोषणा के बाद लालू यादव और नीतीश कुमार के बीच आरोप प्रत्यारोप का घमाशान शुरू हो गया। लालू यादव ने नीतीश कुमार को खुलेआम चैलेंज दे दिया कि है हिम्मत तो नीतीश कुमार लड़े आगामी बिहार विधानसभा चुनाव। लालू यादव ने चैलेंज किया कि नीतीश कुमार जहां से चुनाव लड़ेगा वो वहीं जाकर नीतीश कुमार को चुनाव हराएंगे। वो बात और है कि लालू यादव इस दौरान कई चैलेंज देकर फिर पीछे हट गए थे।

एक वो दौर था जब लालू यादव, और नीतीश कुमार एक साथ दंगा प्रभावित क्षेत्र का दौरा करते थे. चित्र हिंदुस्तान अख़बार के 24 अगस्त 1989 का है जब नीतीश कुमार और लालू यादव दोनों सिर्फ विधायक थे, न मंत्री न सांसद और उस समय सासाराम में दंगा हुआ था. दोनों ने इस दंगे का दौरा किया और उस समय की कांग्रेस की सरकार के ऊपर आरोप लगाया कि यह दंगा क्षणिक उत्तेजना का परिणाम नहीं बल्कि महीनों की तयारी का परिणाम है.

1991 लोकसभा चुनाव में पटना लोकसभा क्षेत्र से पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रा कुमार गुजराल बीजेपी के सी पी ठाकुर के खिलाफ नामांकन किये थे. इंद्र कुमार गुजराल नीतीश कुमार और लालू यादव की पार्टी जनता दल से चुनाव लड़ रहे थे. इसी चुनाव के दौरान लालू यादव जब गुजराल साहब के लिए वोट मांगते थे तब लोगों को बोलते थे कि गुजराल यादव हैं क्यूंकि यादव को हरियाणा में गुज्जर और पंजाब में गुजराल बोलते हैं इसलिए सभी यादव गुजराल को वोट दें. इस चुनाव में इतनी धांधली हुई थी की चुनाव परिणाम आने से पहले ही चुनाव आयोग ने इस चुनाव को रद्द कर दिया था और फिर दुबारा चुनाव यहाँ 1993 में हुआ था लेकिन तब तक जनता दल ने अपना उम्मीदवार बदल दिया था. 1993 में जब चुनाव हुआ तब जनता दल की तरफ से रामकृपाल यादव चुनाव मैदान में उतरे और जीते भी. यह चित्र हिंदुस्तान अख़बार में 26 अप्रैल 1991 को प्रकाशित हुआ था जिसमे आप एक तरफ सी पी ठाकुर को नामांकन करते देख सकते हैं और दूसरी तरफ नीतीश कुमार के साथ इन्द्र कुमार गुजराल को नामांकन करते हुए देख सकते हैं.

समता पार्टी के भीतर ही 1995 के चुनाव के समय ही आपसी फुट थी. कुर्मी चेतना रैली के मुख्य आयोजकों में से एक सतीश कुमार अड़े हुए थे कि वो दो जगह से चुनाव लड़ेंगे: एक सूर्यगढ़ा से और दूसरा आस्थावा से. वो यह दावा इस आधार पर कर रहे थे कि सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी भी दो जगहों से चुनाव लड़ रहे थे. हालाँकि बाद में शकुनी चौधरी ने दुसरे जगह से अपना नामांकन वापस ले लिया लेकिन सतीश कुमार ने नामांकन वापस नहीं लिया. जब पार्टी ने उन्हें दुसरे जगह आस्थावा से टिकट नहीं दिया तो उन्होंने आस्थावा से निर्दलीय नामांकन कर दिया. सतीश कुमार के इस व्यवहार से रंज आकर नीतीश कुमार और ललन सिंह ने अपने ही पार्टी के उम्मीदवार सतीश कुमार को सूर्यगढ़ा से हारने के लिए एडी चोटी एक कर दिया और अंततः सतीश कुमार सूर्यगढ़ा से चुनाव हारे भी.

1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में समता पार्टी की तरफ से सिर्फ नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री के दावेदार नहीं थे बल्कि अब्दुल गफूर जिन्हें सभी गफूर चचा बोलते थे वो भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे समता पार्टी की तरफ से और जॉर्ज फर्नांडिस ने इसकी अधिकारिक घोषणा भी की थी. 22 जुलाई 1994 का यह हिंदुस्तान हिंदी अख़बार देखिये.

1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू यादव ने घोषणा किया कि वो अपने निर्वाचन क्षेत्र राघोपुर और दानापुर में खुद का चुनाव प्रचार करने नहीं जाएंगे। लगे हाथ नीतीश कुमार ने भी घोषणा कर किया कि वो भी अपने निर्वाचन क्षेत्र हरनौत में चुनाव प्रचार करने नहीं जाएंगे। गौर करने वाली बात यह भी है कि नीतीश कुमार विधानसभा चुनाव नहीं लड़ रहे थे क्योंकि उनकी पार्टी के सिद्धांत के अनुसार लोहिया के सिद्धांत के अनुसार कोई भी सांसद सांसद रहते हुए विधायक का चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। लेकिन आखिरी मौके पर जॉर्ज फर्नांडिस ने पत्र लिखकर नीतीश कुमार को आदेश दिया कि वो हरनौत से चुनाव लड़े। जॉर्ज साहब वाली खबर भी नीतीश आर्काइव के पास है। वो भी आपसे जल्दी साझा करेंगे।

1991 के चुनाव में नीतीश कुमार के ऊपर हार का खतरा था क्यूंकि जनता दल में कई फाट हो चुके थे. लेकिन इसके बावजूद नीतीश कुमार इस चुनाव में लगभग एक लाख 65 हज़ार वोटों के अंतर से चुनाव जीते थे. एस लेख का सर्वाधिक रोचक पक्ष यह है कि बीजेपी की तरफ से एस एन आर्य का नाम चल रहा था टिकेट के लिए. यह वही एस एन आर्या हैं जो आगे चलकर नीतीश कुमार की पत्नी, बेटा और माँ का भी इलाज करते हैं. नीतीश आर्काइव ने भी एस एन आर्या का लम्बा इंटरव्यू लिया है जो आप हमारे YouTube चैनल पर जाकर देख सकते हैं.

बिहार विधानसभा चुनाव 1995 में लालू यादव के हाथों करारी हार के बाद समता पार्टी की समीक्षा बैठक का माजरा कुछ ऐसा था कि कोई नेता एक दुसरे से आंख तक नहीं मिला पा रहे थे. और मिलाएं भी तो कैसे? समता पार्टी 7 सीटों पर सिमट गई थी, कारण किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, लालू यादव के समर्थकों को भी विश्वास नहीं हो रहा था कि बिहार में उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार बन चुकी है.

1 मार्च 1995 को चुनाव प्रचार कर रहे नीतीश कुमार के हेलीकॉप्टर के ऊपर रांची के सोनाहातू क्षेत्र में पत्थर से हमला किया गया था जिसमें हेलीकॉप्टर क्षतिग्रस्त हो गया जिससे उनकी चुनावी सभा प्रभावित हुई। इस विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार के प्रचार सभाओं को कई स्थान पर प्रभावित करने का प्रयास किया गया था जिसका सारा दस्तावेज नीतीश आर्काइव के पास इक्कठा हो रहा है।

जो लोग नीतीश कुमार को 1994 के पटना गांधी मैदान कुर्मी एकता रैली के लिए गालियाँ देते हैं और उस कुर्मी एकता रैली को नीतीश कुमार का लालू यादव के खिलाफ षडयंत्र मानते हैं उन्हें 25 जून 1993 को हिंदुस्तान अखबार में इस प्रकाशित इस खबर और चित्र को देखिए जिसमें पटना के रविन्द्र भवन में आयोजित कुर्मी सम्मेलन में लालू यादव भी शामिल हुए थे।

आपको सिर्फ घटना की तिथि और स्थान बताना है बाकी का काम नीतीश आर्काइव की टीम करेगी. चित्र में जो आप देख रहे हैं वह पिछले पचास सालों से बिहार में प्रकाशित विभिन्न अख़बारों का संग्रह है जिसके ऊपर धुल जमी हुई है और नीतीश आर्काइव उस धुल को साफ़ करेगा ताकि इतिहास को जिंदा रखा जा सके.

लखीसराय के मानिकपुर गाँव में 29 मई 1995 को गाँव की पुलिस चौकी में पुलिस की गोली से दिवाकर महतो की हत्या हो गयी थी. उसके बाद पुलिस के डर से गाँव लगभग आधे घरों में ताला लग गया था क्यूंकि झड़प में एक पुलिस वाले की भी मृत्यु हो गई थी. गाँव वालों का आरोप है कि अपना बचाव करने के लिए दरोगा ने ही अपने पुलिस को गोली मार दिया था क्यूंकि जिस हथियार से दिवाकर महतो की हत्या हुई थी उसी हथियार से पुलिस को भी गोली लगी थी. दिवाकर महतो पहले कम्युनिस्ट थे लेकिन बाद में वो समता पार्टी के सदस्य बन गए थे.

लालू प्रसाद के चेहरे पर उदासी और नीतीश कुमार के चेहरे पर ख़ुशी. क्या आप बता सकते हैं कि लालू प्रसाद उदास और नीतीश कुमार खुश क्यूँ हैं ? यह चित्र बिहार विधानसभा का है जब बिहार में 1996 में उपचुनाव हुआ था और चुनाव के परिणाम के बाद का यह चित्र है. पीछे नवनिर्वाचित नौ विधायक खड़े हैं. पहचानिए पीछे कौन कौन विधायक खड़े हैं.

2 सितंबर 2005 को हिंदुस्तान अखबार में छपी यह खबर NDA नेताओं का बक्सर में चुनावी सभा का है जिसका नेतृत्व बक्सर के तत्कालीन युवा जदयू के राष्ट्रीय महासचिव डॉ विनोद कुमार सिंह कर रहे थे। डॉ विनोद कुमार सिंह जी द्वारा नीतीश आर्काइव से संपर्क करने और अखबार का यह कतरन साझा करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। बहुत जल्दी नीतीश आर्काइव आप सभी को डॉ विनोद जी से साक्षात्कार मुलाकात करवाएगी।

नीतीश कुमार की पत्नी मंजु सिन्हा का संभवतः एकमात्र इंटरव्यू जिसमें निशांत कुमार का भी वक्तव्य छपा हैं। यह इंटरव्यू उसी दिन का है जिस दिन 2005 ने गांधी मैदान में नीतीश कुमार जी में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। ये अखबार 25 नवंबर 2005 का है। अखबार के इस कतरन को नीतीश आर्काइव के साथ साझा करने के लिए लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा के सिंटू जी का बहुत बहुत धन्यवाद। नीतीश आर्काइव एक सामूहिक प्रयास है जो आप लोगों के सहयोग के बिना सफल नहीं हो पाएगा।

नीतीश कुमार की पत्नी मंजु सिन्हा का संभवतः एकमात्र इंटरव्यू जिसमें निशांत कुमार का भी वक्तव्य छपा हैं। यह इंटरव्यू उसी दिन का है जिस दिन 2005 ने गांधी मैदान में नीतीश कुमार जी में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। ये अखबार 25 नवंबर 2005 का है। अखबार के इस कतरन को नीतीश आर्काइव के साथ साझा करने के लिए लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा के सिंटू जी का बहुत बहुत धन्यवाद। नीतीश आर्काइव एक सामूहिक प्रयास है जो आप लोगों के सहयोग के बिना सफल नहीं हो पाएगा।

4 मई 2012 को सेवा यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी जब समस्तीपुर के रोसड़ा में सभा करने के बाद पुरनदाही गाँव में समता पार्टी के संस्थापक सदस्य स्वर्गीय राम बहादुर मंडल के घर पर श्रधांजलि देने पहुंचे तो मुख्यमंत्री जी की आंखे डबडबा गई थी. यह चित्र हमें राम बहादुर मंडल जी के परपौत्र मनीष कुमार सुमन जी ने उपलब्ध करवाया है. मनीष कुमार सुमन जी ने अपने दादाजी और नीतीश कुमार के बीच की दोस्ती की बहुत सारी कहानियां सुनाने का वादा किया है जो हम बहुत जल्दी आपतक विडियो के रूप में उपलब्ध करवाएंगे.

जननायक कर्पूरी ठाकुर रचना चक्र के संस्थापक थे नीतीश कुमार जो जननायक कर्पूरी ठाकुर विचार केंद्र के साथ मिलकर प्रति वर्ष कर्पूरी ठाकुर की जयंती मनाते थे. 24 जनवरी 1993 को कर्पूरी जयंती मानाने के लिए सभी पटना के रविन्द्र भवन में इकठ्ठा हुए थे जिसमे नीतीश कुमार के साथ लालू सरकार के कई मंत्री हैं लेकिन लालू यादव नहीं है. क्या आप बता सकते हैं कि लालू यादव की अनुपस्थिति के क्या कारण हो सकते हैं ?

1993 में जब लालू यादव की सरकार ने पंचायती राज में पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रावधान रखा और उसमे कुर्मी को भी पिछड़ों की सूचि में शामिल किया तो यह संभवतः प्रयास था नीतीश कुमार के पीछे लगातार गोलबंद होते कुर्मी को अपनी तरफ करने के लिए. यह अख़बार 18 दिसंबर 1993 का है जबकि इस दिन से ठीक छः महीने के भीतर नीतीश कुमार जनता दल के 14 सांसदों को अलग करके अलग पार्टी बनाने वाले थे. अखबार के इस कतरन को नीतीश आर्काइव के साथ साझा करने के लिए लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा से डॉ सुनील कुमार जी का बहुत बहुत धन्यवाद। बहुत जल्दी हम आपको डॉ सुनील जी से रूबरू कराएंगे। उनके पास नीतीश कुमार से संबंधित कई रोचक स्मृतियां और कहानियां है।

जो लोग बोलते हैं कि नीतीश कुमार ने कुर्मी चेतना रैली में शामिल होने का फैसला आखिरी वक्त पर लिए थे वो इस खबर के बारे में क्या कहेंगे जिसके अनुसार नीतीश कुमार कुर्मी चेतना रैली की तैयारी के लिए 16 जनवरी 1994 को हुए मीटिंग में पहली पंक्ति में बैठे हुए हैं? यह खबर 17 जनवरी को नवभारत टाइम्स अखबार में छपी थी। अखबार के इस कतरन को नीतीश आर्काइव के साथ साझा करने के लिए लखीसराय के डॉ सुनील कुमार सिंह जी का आभार।

1994 में जब नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस ने लालू यादव के जनता दल से अलग होने का घोषणा किया तो नीतीश और जॉर्ज के साथ साथ उनके समर्थकों और कार्यकर्ताओं के ऊपर बिहार में लगातार हमले होने लगे और पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने लगी। ऐसे ही एक झगड़े में मुंगेर में नीतीश जॉर्ज के दर्जन भर समर्थक को पुलिस ने जेल में बंद कर दिया और जब नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस के साथ शिवानंद तिवारी अपने समर्थकों से मिलने जेल पहुंचे तो तीनों को जेल प्रशासन ने 45 मिनट तक इंतजार करवाया उसके बाद मिलने दिया।

मई 1994 में जब नीतीश कुमार, जॉर्ज फर्नांडिस और उनके अन्य साथियों ने मिलकर जनता दल से अलग होकर नयी पार्टी (जनता दल-जॉर्ज) बनाने की घोषणा की तो पुरे बिहार में लालू यादव के समर्थकों ने नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस के समर्थकों के ऊपर हमला करना शुरू कर दिया. इसी दौरान नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस के कार पर मुजफ्फरपुर में हमला किया गया. इस हमले के बाद नीतीश-जॉर्ज के समर्थक बिहार के अलग अलग हिस्सों में प्रदर्शन किये. उन्हीं प्रदर्शनों में से एक प्रदर्शन पटना के डाक बंगला चौराहा पर भी हुआ था.

11 अगस्त 1994 का आज अख़बार का यह कतरन कई सवाल खड़ा कर रहा है. १) उस समय बिहार में लालू यादव का सरकार कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन से चल रहा था लेकिन उसके बावजूद सूर्यगढ़ा को मुंगेर जिला का हिस्सा बनाने के लिए नीतीश कुमार और उनके समर्थकों द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन में क्षेत्र के कम्युनिस्ट सांसद ने लालू सरकार के फैसले का विरोध किया और विरोधी नीतीश कुमार की पार्टी का समर्थन किया. २) इस आन्दोलन को कुर्मी का रंग दिया गया क्यूंकि सूर्यगढ़ा कुर्मी बहुल क्षेत्र था. ३) सरकार इस आन्दोलन को कुचलने का हर संभव प्रयास की, नेताओं को गिरफ्तार आन्दोलनकारियों से मिलने तक नहीं देती थी.

मई 1994 में जब जनता दल के 14 सांसद नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में अपने आप को अलग करके नई पार्टी बनाने की घोषणा की तब उस पार्टी का ना था जनता दल (जॉर्ज) लेकिन 19 अक्टूबर 1994 को पटना में विशाल रैली में नई पार्टी का नाम रखा गया समता पार्टी। पार्टी का नाम बदलने से संबंधित कोई कहानी आपको पता है तो कृपया हमारे साथ साझा करें।

दिन में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद नीतीश कुमार जी ने जब शाम को बख्त्यारपुर में बैठी अपनी माँ को फोन किया तो माँ ने मगही (मगधी) भाषा में दो टुक फ़ोन पर सिर्फ एक निर्देश दिया अपने बेटे को: “काम कर, सदा आशीर्वाद हय। हम सब टीवी पर देखली हल। अब काम बढ़ गेलो ह, खूब बढ़िया काम कर। सारा आदमी के नजर तोरे पर हई।”

1993 में जब लालू सरकार ने आरक्षण का कर्पूरी फार्मूला रद्द कर अति-पिछड़ों और महिलाओं का आरक्षण ख़त्म किया तब नीतीश कुमार पहले नेता थे जिन्होंने उसका विरोध किया. 2 फरवरी 1993 का लेख पढ़िए. इसके पहले लालू यादव जी ने महिलाओं को शिक्षक नौकरी में 50% आरक्षण था उसे भी ख़त्म कर दिया था

1/3 21 जनवरी 1993 के इस खबर के अनुसार लालू यादव द्वारा पटना के गाँधी मैदान में आयोजित सद्भावना रैली के दौरान जब नीतीश का फोटो सभी बैनर पोस्टर से गायब कर दिया गया था तभी जनता दल में बढ़ते फुंट और नीतीश-लालू की बढती दूरियों का बाज़ार गर्म हो गया था. जिन लोगों को ये लगता है कि

1/3″नीतीश कुमार को गधा बनाया” जब जून 1994 में नीतीश कुमार के साथ बिहार के जनता दल के दस अन्य सांसद, उत्तर प्रदेश से जनता दल के दो और ओड़िसा से जनता दल के एक सांसद ने लोकसभा में अपने आप को जनता दल के अन्य सांसदों से अलग करके अलग बैठना प्रारंभ कर दिया और लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल

1994 में जब नीतीश कुमार और उनके साथियों ने लालू यादव से अलग होकर अलग पार्टी बनाने की घोषणा की थी तब लालू यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह घोषणा किया था कि अगले वर्ष होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में वो कुर्मी बहुल हरनौत विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे जहां से 1985 में पहली बार नीतीश कुमार विधायक बने थे। कुर्मी चेतना रैली के बाद नीतीश कुमार के सर्वमान्य कुर्मी नेता निर्वाचित होने के बावजूद लालू यादव दावा कर रहे थे कि उन्हें कुर्मी समाज का पूरा बहुमत है। हालांकि बाद में जब चुनाव हुआ तो लालू यादव यादव बहुल राघोपुर से चुनाव लड़े और हरनौत में नीतीश कुमार ने लालू यादव की पार्टी के उम्मीदवार विश्व मोहन चौधरी को तेरह हजार वोट से चुनाव हराया इसके बावजूद कि लालू यादव ने कुर्मी वोट को बांटने के लिए अरुण कुमार और वीर चंद पटेल दो बड़े दिग्गज कुर्मी नेता को हरनौत से निर्दलीय चुनाव लड़वाया लेकिन उसके बावजूद नीतीश कुमार चुनाव जीते।

1994 में जब नीतीश कुमार और उनके साथियों ने लालू यादव से अलग होकर अलग पार्टी बनाने की घोषणा की थी तब लालू यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह घोषणा किया था कि अगले वर्ष होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में वो कुर्मी बहुल हरनौत विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे जहां से 1985 में पहली बार नीतीश कुमार विधायक बने थे। कुर्मी चेतना रैली के बाद नीतीश कुमार के सर्वमान्य कुर्मी नेता निर्वाचित होने के बावजूद लालू यादव दावा कर रहे थे कि उन्हें कुर्मी समाज का पूरा बहुमत है। हालांकि बाद में जब चुनाव हुआ तो लालू यादव यादव बहुल राघोपुर से चुनाव लड़े और हरनौत में नीतीश कुमार ने लालू यादव की पार्टी के उम्मीदवार विश्व मोहन चौधरी को तेरह हजार वोट से चुनाव हराया इसके बावजूद कि लालू यादव ने कुर्मी वोट को बांटने के लिए अरुण कुमार और वीर चंद पटेल दो बड़े दिग्गज कुर्मी नेता को हरनौत से निर्दलीय चुनाव लड़वाया लेकिन उसके बावजूद नीतीश कुमार चुनाव जीते।

27 जून 1994 को नीतीश कुमार समेत बिहार के दस सांसद, उत्तर प्रदेश के दो और उड़ीसा के एक और कर्नाटक के एक सांसद ने मिलकर 14 सांसद अपने आप को लालू यादव के जनता दल से अलग कर लिया और अपनी नई बनाने की घोषणा कर दिया। 21 जून को इन चौदह सांसदों ने मिलकर लोकसभा स्पीकर से आग्रह किया था कि लोकसभा में उनके बैठने के लिए जनता दल से अलग सीट की व्यवस्था करें क्योंकि वो जनता दल के साथ नहीं रहना चाहते है।

नीतीश कुमार जब जनता दल से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बनाए तो CPI के कुर्मी नेता सतीश कुमार भी अपनी पार्टी छोड़कर नीतीश कुमार के साथ आ गए। लेकिन लालू यादव को मुलायम सिंह के ऊपर बहुत भरोसा था और सबसे बड़ा धोखा मुलायम सिंह से ही मिला। लालू यादव की सरकार ने मंत्री रामदेव सिंह यादव ने लालू मंत्रालय से इस्तीफा देकर समाजवादी पार्टी का बिहार में प्रदेश अध्यक्ष बन गए। ये लालू यादव के लिए सबसे बड़ा धक्का था, नीतीश कुमार से भी अधिक बड़ा धक्का था क्योंकि नीतीश कुमार पार्टी छोड़ने वाले है इसकी खबर महीनों से चल रही थी और लालू यादव मुलायम सिंह से समर्थन के प्रति सर्वाधिक आश्वस्त थे।

1996 के लोकसभा चुनाव में बिहार के 54 सीटों में से NDA को 24 और लालू यादव के जनता दल को 22 सीटों पर जीत मिली थी। देश में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार भी बनी थी। इसी चुनाव परिणाम के आने के बाद नीतीश कुमार ने लालू यादव के नैतिक आधार पर बिहार में सरकार से इस्तीफा की मांग की थी क्योंकि इस चुनाव में लालू यादव की पार्टी को 54 में से 22 सीट जो की कुल सीट का आधा भी नहीं सीट पर जीत मिली थी।

23 नवम्बर 1972 को जिस बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के छात्रों ने नीतीश कुमार (तत्कालीन छात्र संघ अध्यक्ष) के नेतृत्व में राज्य सड़क ट्रांसपोर्ट निगम के तीन सरकारी बसों को पटना विश्वविद्यालय कैम्पस क्षेत्र से हाइजैक करके समाचार पत्रों के कार्यालय क्षेत्र में ले गए ताकि समाचार पत्र वाले उनके द्वारा कए जा रहे प्रदर्शन के प्रति अपना ध्यान दे और उसे समाचार में छापे। उस समय बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के छात्र संघ अध्यक्ष नीतीश कुमार थे और पटना विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष रामजतन सिन्हा थे। रामजतन सिन्हा पहले कांग्रेस और फिर बाद में नीतीश कुमार की पार्टी JDU में भी शामिल हुए। बस को हाईजैक करने की इसी घटना के बाद नीतीश कुमार का नाम सभी लोग जान गए थे और जयप्रकाश नारायण का भी ध्यान नीतीश कुमार की तरफ इसी घटना के बाद गया था। यह घटना नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण कड़ी है। उस समय बिहार के छात्र नेता रहे हेमंत दयाल और शुभ्रा दिवेदी के बारे में किसी को कोई जानकारी है तो कृपया हमसे साझा ज़रूर करें।

26 अगस्त 1973 में प्रकाशित पत्रिका धर्म-युग में नीतीश कुमार का लेख। उस समय पटना की सड़कों पर पुलिस और छात्रों के बीच हिंसक संघर्ष हो रहा था और उसी मुद्दे पर नीतीश कुमार ने यह लेख लिखा था। “नीतीश कुमार की दृष्टि में मामूली लाठीधारी सिपाही और सामाजिक परिवर्तनों के आग्रही छात्रों- दोनो का वर्ग चरित्र एक है। अंतर इतना ही है कि वर्दी धारण करते ही सिपाही के मन में एक अहंभाव आ जाता है कि मेरे पास एक शक्ति है। अपनी शक्ति का प्रयोग वह रिक्शा-खोमचों वालों, मामूली आदमियों पर करता है। अफ़सर की डाँट से डरे सिपाही के अंदर की शासकीय मनोवृति उसे दमन करने के लिए प्रेरित करती है। इन सबके बावजूद उसके चरित्र को बदला जा सकता है, परंतु वर्तमान व्यवस्था में उसका चरित्र बदलना एक कष्ट-साध्य कार्य है। पुलिस से विरोध का अर्थ स्पष्टतः वरमन व्यवस्था का विरोध है। आम आदमी या छात्रों के मन में पुलिस शासन की दमन प्रवृति की प्रतीक है। ऐसा सोचने का कारण है कि पुलिस का होना सुरक्षा की गारंटी नहीं है। उसके व्यवहार से हम परिचित हैं। छात्र-पुलिस संघर्ष मूल संघर्ष की बुनियाद पर खड़ा होता है। प्रायः पुलिस के हस्तक्षेप के बाद संघर्ष समाप्त होने लगता है। इसके पीछे मूल कारण है छात्र-नेतृत्व की कमजोरी। नेतृत्व अधिक समय तक आंदोलन चलाए जाने के लिए तैयार नहीं होता है। छात्र समुदाय भी सीमित गिरोह स्वार्थ में फँसा रहता है। वह पुनः-परीक्षा, ग्रेस मार्क, या तात्कालिक समस्ययों को लेकर संघर्ष करता है। वह तात्कालिक लाभ देखता है–दूरगामी लाभ नहीं। ऐसी स्थिति में आंदोलन को असरदार बनाये रखने के लिए प्रायः छात्र-नेतृत्व भी ऐसी स्तिथि उत्पन्न करता है कि छात्र-पुलिस संघर्ष हो।”

नीतीश कुमार कांग्रेस के बिहारी नेता सीताराम केसरी को “भारतीय राजनीति का चचा” बोलते थे और उनके sixth सेंस के कायल हुआ करते थे। वर्तमान रणजीत में हिंदुस्तान की राजनीति में नीतीश कुमार को भी उनके प्रशंसक के साथ साथ उनके विरोधी भी प्यार से नीतीश चचा ही बोलते हैं और नीतीश कुमार के sixth सेंस के भी कायल हैं। आप बताइए कि भारतीय राजनीति के तीन चाचाओ (चाचा नेहरू, नीतीश चचा और केसरी चचा) में से आप किस चचा को सबसे अधिक प्रेम करते हैं?

19 अक्तूबर 1994 को गांधी मैदान में एक विशाल जनसभा के सामने समता पार्टी की आधिकारिक घोषणा हुई। इसी जनसभा में सम्राट चौधरी के पिता शकुनि चौधरी कांग्रेस छोड़कर समता पार्टी में आए थे और उनके साथ जनता दल के दो अन्य विधायक दिवाकर सिंह और वशिष्ठ नारायण सिंह भी समता पार्टी में आए। इस रैली के बारे में राजनीतिक गलियारों में इतनी चर्चा थी कि लालू यादव ने पहले ही घोषणा कर दिया कि वो 31 अक्टूबर को उसी गांधी मैदान में एक करोड़ लोगों की रैली करेंगे। कम्युनिस्ट पार्टी ने भी घोषणा कर दिया कि इस रैली के बाद 20 अक्टूबर को वो पार्टी की मीटिंग करेंगे और फैसला लेंगे कि वो लालू यादव को अपना समर्थन देंगे या नीतीश कुमार को। तीसरी तरफ बीजेपी के अंदरखाने में पहले से ही चर्चे थे कि इस रैली को बीजेपी पहले ही गैर-आधिकारिक तौर पर समर्थन दे चुकी है और अपने कार्यकर्ताओं को भी रैली में जाने से मना नहीं कर रही है। बीजेपी ने तय कर लिया था कि इस रैली के बाद वो नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा बना सकते हैं। पर यह रैली उतनी सफल नहीं हुई जितनी आशा थी। इस रैली में कुर्मी एकता रैली से कम भीड़ थी और इसी कम भीड़ को देखते हुए कम्युनिस्ट ने नीतीश कुमार की जगह लालू यादव को अपना समर्थन देने का फैसला लिया और बीजेपी ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री चेहरा स्वीकार करने से मना कर दिया। जून में जनता दल से अलग होने के बाद नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस वाली पार्टी को जनता दल (G) बोलते थे जिसमें G का मतलब जॉर्ज फर्नांडिस थे लेकिन तब उसका अधिकार नाम जनता दल (G) नहीं बल्कि वो ओरिजनल जनता दल होने का दावा कर रहे थे। उन्हें उम्मीद था कि उड़ीसा से बीजू पटनायक और कर्नाटक से देवे गौड़ा और उनके समर्थक भी लालू यादव वाली जनता दल छोड़कर उनके जनता दल में आ जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ, आगे चलकर दोनों अपनी अपनी अलग पार्टी बना लिए और नीतीश कुमार को समता पार्टी बनाना पड़ा। नीतीश कुमार पार्टी का नाम जनता दल (G) नहीं रखना चाहते क्योंकि उनके अनुसार अब जनता दल शब्द को लालू यादव ने इतना बदनाम कर दिया था कि जनता दल नाम से ही लोग भड़क जाते है। कुछ लोगों का ये भी मानना है कि नीतीश कुमार पानी पार्टी में जॉर्ज फर्नांडिस के बढ़ते प्रभाव को कम करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने पार्टी का नाम समता पार्टी रखा था। इस दौरान जॉर्ज फर्नांडिस अपनी प्रेमिका जया के साथ बिहार के खूब दौरे कर रही थी।

फरवरी में कुर्मी चेतना रैली और जून में जनता दल में फुंट पड़ने के बीच मई की यह घटना जिसमे जनता दल के उम्मीदवार को वैशाली लोकसभा उप-चुनाव में आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद ने पहली बार पार्टी बनाकर (बिहार पीपुल्स पार्टी (BPP)) चुनाव हरा दिया था. उस समय यह लालू यादव के लिए सबसे बड़ी क्षति बताई गई थी और इस चुनाव में तो नीतीश कुमार के सहयोगी ब्रिषण पटेल के भाई लवली आनंद के लिए खुलेआम वोट मांगे थे और आरोप यह भी लगा था कि नीतीश कुमार के सभी सहयोगी अन्दर से चाहते थे कि आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद की जीत हो ताकि लालू यादव कमजोर पड़े. लेकिन हुआ उल्टा आनंद मोहन यह चुनाव जितने के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में बिहार के लगभग सभी सीटों पर अपना उम्मीदवार उतार दिए जिससे लालू विरोधी वोट विभाजित हो गया जिसका फायदा लालू यादव को हो गया. क्यूंकि आनंद मोहन राजपूत समाज से थे और उनका ज्यादातर समर्थक सवर्ण थे और लालू यादव के घोर विरोधी थे इसलिए नुकसान नीतीश कुमार को हुआ क्यूंकि सवर्ण भी नीतीश कुमार का समर्थन कर रहे थे.

28 दिसंबर 1994 को पटना में आयोजित बिहार प्रदेश महिला समता पार्टी के एक सम्मेलन में नीतीश कुमार जी ने 22 पृष्ठ का एक महिला नीति जारी किया था। नोट करने वाली पहली बात तो ये है कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनाने से बहुत पहले ही महिला उत्थान के प्रति सजग थे। दूसरी नोट करने वाली बात ये है कि खबरों में चाहे नीतीश कुमार के वक्तव्य अधिक छपते होंगे लेकिन खबर की शीर्षक में नीतीश कुमार को शायद ही कभी स्थान मिलता था। मतलब नीतीश कुमार पार्टी के बुद्धिजीवी थे। और अंतिम नोट करने वाली बात एक आग्रह है कि अगर आपमे से किसी को भी इस 22 पृष्ठ वाली महिला नीति बुकलेट के बारे में कोई भी जानकारी हो तो कृपया हमे जरूर बताएं।

1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार हरनौत विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे लेकिन पञ्च साल विधायक, 6 साल सांसद और एक साल केन्द्रीय राज्य मंत्री रहने के बावजूद नीतीश कुमार का अपना ही गाँव विकास के मामले में पिछड़ा हुआ था. मुख्या सड़क से कल्याणबीघा का पञ्च किलो मीटर का रास्ता गड्ढों से भरा हुआ था नीतीश कुमार उस क्षेत्र का सांसद और विधायक दोनों रहने के बावजूद नहीं बनवा रहे थे. लेकिन इसके बावजूद कल्याण बीघा के लोग नीतीश कुमार का समर्थन कर रहे थे और बोल रहे थे कि नीतीश कुमार की नजर पुरे बिहार को सुधारने पर है न कि अपना गाँव, अपना परिवार, अपना दोस्त या अपना क्षेत्र. उस दौर में कल्याण बीघा में लगभग 24 डॉक्टर और कई इंजिनियर थे. नीतीश कुमार के भाई सतीश कुमार गाँव में ही अपने 22 जमीन पर खेती करते थे और साथ में वैध का काम करते थे और माँ के साथ रहते थे. नीतीश कुमार की घर की हालत ऐसी थी कि गाँव वाले बताते थे कि अगर दस आदमी घर की छत पर एक साथ चढ़ जाए तो घर की छत गिर जाये लेकिन इसके बावजूद नीतीश कुमार अपने परिवार के लिए एक घर तक नहीं बनवाते थे.

दो गौर करने वाली बात। 1) समता पार्टी को अखबारों में SP मतलब सपा बोला जाता था। आजकल सपा का मतलब सिर्फ अखिलेश यादव और मुलायम सिंह का समाजवादी पार्टी ही है। २) 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में हार के बाद नीतीश कुमार पहली बार किसी सार्वजनिक सभा में गये तो लालू यादव को इस बात के लिए खूब लताड़ा कि लालू यादव ने बिहार में संपूर्ण क्रांति दिवस को विजय दिवस के रूप में मनाया था। लालू यादव के अनुसार विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की जीत जे पी के संपूर्ण क्रांति के सपने का साकार होना था।

बीजेपी के बॉम्बे सम्मेलन में समता पार्टी के नेता नीतीश कुमार और जया जेटली के जाने के बाद समता पार्टी में भूचाल आ गया। चंद्रजीत यादव, शहाबुद्दीन और रवि राय के नेतृत्व में समता पार्टी के भीतर विद्रोह इस बात को लेकर हो गया कि समता पार्टी के नेता रहते हुए नीतीश कुमार बिना पार्टी के अनुमति के बीजेपी के सम्मेलन में क्यों चले गए। जॉर्ज फर्नांडिस बोलते रहे कि नीतीश कुमार के बीजेपी सम्मेलन में जाने का अर्थ बीजेपी के साथ समझौता या गठबंधन नहीं है और वो फोर्थ फ्रंट बनाना चाहते है जो बीजेपी, कांग्रेस और जनता दल तीनों से अलग हो। लेकिन जॉर्ज फर्नांडिस के बार बार बोलने के बावजूद इन्द्रजीत यादव और शहाबुद्दीन ने अपनी एक अलग पार्टी समता दल बना लिया। अपना पार्टी बनाने से पहले उन्होंने नीतीश कुमार को ही समता पार्टी से निकाल दिया था लेकिन जब नीतीश कुमार का समता पार्टी में अधिक समर्थन देखा तो अपनी नई पार्टी बना ली। इस पार्टी को लालू यादव ने अपना समर्थन दिया और थर्ड फ्रंट का हिस्सा बनाया लेकिन ये पार्टी समय के साथ इतिहास में विलीन हो गई।

जब नीतीश कुमार के ऊपर लगा चारा चोरी का आरोप। 1996 के लोकसभा चुनाव में जब लालू यादव के हजार प्रयास के बावजूद नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव जीत गए और साथ में NDA को पूरे बिहार में 24 सीटों पर जीत मिली तो लालू यादव चारा चोरी में पकड़े गए श्याम बिहारी सिन्हा से यह बयान दिलवा दिए कि नीतीश कुमार भी चारा घोटाला का पैसा ले रहे थे। लालू यादव नीतीश कुमार की लोकसभा चुनाव में जीत पचा नहीं पा रहे थे क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने ऐलान किया था कि इस बार नीतीश कुमार चुनाव में अपना जमानत भी नहीं बचा पाएगा लेकिन हुआ उसका उल्टा। न सिर्फ नीतीश कुमार बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीते बल्कि कुर्मी बहुल नालंदा से उन्होंने जॉर्ज फर्नांडिस को चुनाव जितवाया। इन दोनों जीत के बाद नीतीश कुमार को कुर्मी का अखंड नेता मान लिया गया जो नालंदा से जिसे चाहे उसे चुनाव जीता सकते हैं।

1996 का लोकसभा चुनाव में जब परिणाम आने लगे तो नीतीश कुमार भी जीते, जॉर्ज फर्नांडिस भी जीते जबकि लालू यादव का जनता दल बिहार 54 में से 22 सीटों पर सिमट गई और लालू यादव का प्रधानमंत्री बनने के सपना चकनाचूर हो गया। अभी परिणाम पूरा आया भी नहीं था और नीतीश कुमार ने दावा कर दिया था कि जनता दल को आधे सीट पर भी जीत नहीं मिलेगी और नीतीश कुमार लालू यादव से हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा मांगने लगे। नीतीश कुमार NDA की सरकार बनने के प्रति इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने यहां तक घोषणा कर दिया कि NDA की सरकार बनते ही बिहार में घोटालों की अच्छे से जांच करेगी और लालू सरकार को बर्खास्त करेगी। चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी उभरी और NDA की सरकार भी बनी लेकिन 13 दिन के बाद अटल बिहारी की सरकार गिर गई।

बिहार के लिए NDA के नेताओं से भी लड़ जाते थे नीतीश जी ये न्यूजपेपर कटिंग मार्च 1997 का है जबकि नीतीश कुमार का समता पार्टी वर्ष 1996 में ही NDA में शामिल हो चुकी थी। NDA में होने के बावजूद जब बीजेपी नेता प्रमोद महाजन ने रेल मंत्री रामविलास पासवान के ऊपर आरोप लगाया कि रामविलास पासवान बिहार को कुछ ज्यादा ही रेल योजनाओं में हिस्सा दे रहे हैं तो नीतीश कुमार भड़क गए प्रमोद महाजन के ऊपर। उस समय रामविलास पासवान सत्ता में थे और नीतीश कुमार विपक्ष में लेकिन उसके बावजूद नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान का बचाव किया और बोला कि बिहार के साथ दशकों से भेदभाव किया गया है, दशकों से बिहार की उपेक्षा की गई है और थोड़ा रेल में मिल रहा है तो प्रमोद महाजन को दर्द क्यों हो रहा है।

मई 1997 में नीतीश कुमार पहली बार बिहार समता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने जबकि जॉर्ज फर्नांडिस राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहे। तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ बाबू ने नीतीश जी का नाम आगे किया जिसका समर्थन सम्राट चौधरी के पिता शकुनि चौधरी और रमेश प्रसाद सिंह ने समर्थन किया। अब्दुल गफूर पहले प्रदेश अध्यक्ष थे जबकि वशिष्ठ नारायण सिंह दूसरे और उसके बाद नीतीश कुमार समता पार्टी के तीसरे प्रदेश अध्यक्ष बने थे। इस बैठक में नीतीश कुमार को समता पार्टी के राष्ट्रीय परिषद में 64 में से 54 सदस्य निर्वाचित करने का भी अधिकार दिया गया जिसका समर्थन दिग्विजय सिंह पूर्व कांग्रेस नेता सुधा श्रीवास्तव ने भी समर्थन किया था।

1998 में जब पहली बार बाजपेयी सरकार में मंत्रालय का गठन हो रहा था तब नीतीश जी को लोकसभा स्पीकर का पद ऑफर किया गया था लेकिन नीतीश जी ने वो पद लेने से साफ इनकार कर दिया जिसके पीछे संभवतः दो तीन कारण थे। 1) स्पीकर का पद नेता को मौनी बाबा बना देता है क्योंकि वो किसी पार्टी का नेता नहीं बचता है। उसके लिए सभी पार्टी समान है फिर चाहे वो पक्ष में हो या विपक्ष में। विपक्ष में लालू यादव की पार्टी थी तो नीतीश कुमार ये पद कैसे ले सकते थे। २) लोकसभा स्पीकर अपना ज्यादातर समय दिल्ली में गुजरते हैं लेकिन नीतीश कुमार को भविष्य में राजनीति बिहार की करनी थी। ३) स्पीकर का आम जनता से जुड़ाव बहुत कम होता था लेकिन नीतीश कुमार को आम जनता का नेता बनना था।

बतौर रेल मंत्री नीतीश कुमार का पहला रेल बजट (1998-99). १) इस बजट में नीतीश कुमार ने रेल किराए में वृद्धि तो किया लेकिन बुजुर्ग को मिलने वाले किराया रियायत को 25% से बढ़ाकर 30% कर दिया गया. २) पहले तत्काल सेवा कुछ ही ट्रेन में उपलब्ध थी जिसे नीतीश कुमार ने सभी सुपरफ़ास्ट ट्रेनों में लागु कर दिया. ३) केन्द्रीय नौकरियों के लिए इंटरव्यू के लिए जाने वाले अभियार्थियों को यात्रा मुफ्त कर दिया गया लेकिन सिर्फ द्वितीय श्रेणी में.

3 जून 1994 का अखबार जिसमें लालू और नीतीश कुमार के समर्थकों के बीच बढ़ते तनाव को पढ़ा जा सकता है। आम धरना के विपरीत इस बढ़ते तनाव में युवा और छात्र अग्रिम भूमिका निभा रहे थे। राजद नेता कुमार सर्वजीत के पिता राजेश कुमार नीतीश जिनका साथ देने वाले तीन मुस्लिम सांसदों के बारे में बोल रहे है कि तीन में से दो का पैर कब्र में है और एक पागल होने की कगार पर है। नीतीश जी का साथ देने वाले मुस्लिम नेताओं में अब्दुल गफूर प्रमुख थे। क्या आप उस नेता का नाम बता सकते हैं जिनके बारे में राजेश कुमार बोल रहे है कि वो पागल होने के कगार पर हैं।

नीतीश कुमार के रेल मंत्री बनने से पहले RPF को रेल या रेल परिसर के भीतर किसी भी तरह के गैर-क़ानूनी काम होने पर FIR दर्ज करने तक का अधिकार नहीं था लेकिन रेल मंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने RPF को न सिर्फ FIR दर्ज करने का अधिकार दिया बल्कि उन्हें केस का जाँच करने का भी अधिकार दिया. पहले RPF का सिर्फ एक काम था कि वो रेल की संपत्ति की निगरानी करे, उसे चोरी होने या नुकशान होने से रोके.

नीतीश कुमार जब रेल मंत्री बने तो उन्हें पता चला कि पिछली सरकार में जब रामविलास पासवान रेल मंत्री थे तो उन्होंने एक वर्ष में 3 करोड़ रूपये का फ्री पास बाँट दिया था. नीतीश कुमार ने न सिर्फ रामविलास पासवान द्वारा जारी किये गए फ्री पास को रद्द किया बल्कि अपने 9 महीने के कार्यकाल में मात्र 9 लाख रूपये का फ्री पास जारी किया.

नीतीश कुमार जब रेल मंत्री थे तब अक्सर स्पेशल ट्रेन में दिल्ली से पटना आते थे जैसे आजकल मोदी जी के लिए स्पेशल प्लेन चला हुआ है. ऐसा करने वाले नीतीश कुमार पहले रेल मंत्री थे और नीतीश कुमार की प्रत्येक रेल यात्रा पर उस समय लगभग पञ्च लाख रूपये खर्च होते थे. इनकी ट्रेन में ४-५ डब्बे होते थे जिसमे नीतीश कुमार के अलावा इनके कर्मचारी, RPF एव अन्य प्रकार के रक्षक और रेलवे के उच्च अधिकारी. आप इस फुजूल खर्ची का आलोचना कर सकते हैं लेकिन नीतीश कुमार का तर्क था कि अगर वो इस तरह विशेष ट्रेन से रेल अधिकारीयों के साथ यात्रा करेंगे तो रस्ते में जितने भी अव्यवस्थित रेलवे स्टेशन और रेल सुविधाएँ हैं उनसे रूबरू हो सकते हैं और उसका समाधान तत्काल कर सकते हैं. नीतीश कुमार के इस प्रयास का कितना प्रभाव पड़ा इसका तो गहन अध्ययन करना पड़ेगा.

रेल मंत्री नीतीश कुमार ने जब अपने पैत्रिक क्षेत्र हरनौत में रेल डब्बा कारखाना बनाने का फैसला लिया तो तत्कालीन मीडिया ने उनका इस बात के लिए आलोचना किया. पत्रकारों का तर्क था कि चुकी हिंदुस्तान में पहले से ही जरुरत से अधिक रेल डब्बे बन रहे हैं इसलिए नया रेल डब्बा कारखाना बनाने की कोई जरुरत नहीं है. क्या जरुरत से अधिक रेल डब्बे बनेंगे हिंदुस्तान में तो उसका निर्यात भी तो हो सकता था ? आज भारत ब्रिटेन, सऊदी अरब फ्रांस, और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों को हजारो रेल के डिब्बे निर्यात करता है.

2004 लोकसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार बाढ़ और नालंदा दोनों लोकसभा से चुनाव के मैदान में थे. क्या नीतीश कुमार डर गए थे कि कहीं बाढ़ में उनकी हार न हो जाये ? जॉर्ज फर्नांडिस नालंदा छोड़कर मुजफ्फरपुर क्यूँ गए चुनाव लड़ने? सभी सवालों का जवाब दे रहे हैं खुद नीतीश कुमार, इस साक्षात्कार में.

राजनीती में बाबाओं का महत्व हमेशा से रहा है. बाबाओं के ऊपर विस्वास करने वालों में राम रथ यात्रा रोकने वाले लालू यादव भी थे, छठपूजा करने वाली राबड़ी देवी भी, अपने आप को नास्तिक बोलने वाले रामविलास पासवान भी और सभी के साथ संयम बनाने वाले नीतीश कुमार भी. लोकसभा चुनाव 1999 में NDA की जीत के बाद लालू जी और राबड़ी जी किसी केला वाले बाबा से मिले थे जो प्रसाद में केला देते थे ताकि अगले बिहार विधानसभा चुनाव में वो चुनाव जीत सके.

नवम्बर 2005 में नीतीश कुमार की सरकार बनी और दो महीने के भीतर जनवरी 2006 में बिहार के सभी मेडिकल कॉलेज में सीटों की संख्या दो गुनी कर दी गई. आनन् फानन में ऐसा इसलिए किया गया था क्यूंकि इसी समय दिल्ली के एम्स समेत देश के विभिन्न मेडिकल कॉलेज में OBC आरक्षण लागू करने के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा था. ओबीसी आरक्षण का प्रतिकूल प्रभाव सामान्य वर्ग के छात्रों के ऊपर नहीं पड़े इसके लिए बिहार के सभी मेडिकल कॉलेज में सीटों की संख्या दो गुनी कर दी गई.

यादव की बारात: नीतीश जी भी बने लालू के गेस्ट मिस भारती की शादी में एक अन्ने मार्ग पर कई रोचक घटना हुई थी, सिर्फ शोरूम से गाड़ी उठाने वाली ही घटना नहीं हुई थी। उन रोचक घटनाओं के ऊपर पत्रकार सुरेश नायर की मजेदार रिपोर्ट। इस रिपोर्ट में १) नीतीश जी का गेस्ट बनना २) मुलायम सिंह का मात्र १५ मिनट के लिए आना। ३) लालू जी का सबकी बेटी वाला बयान। इस तरह की कई रोचक घटना घटी थी।

22 दिसंबर 1999 को समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह यादव के इशारे पर देवेन्द्र सिंह यादव एवं अन्य सहयोगी सांसदों ने नीतीश कुमार के ऊपर हमला करने का प्रयास किया था क्यूंकि लोकसभा के सभापति ने नीतीश कुमार के जवाब देने से पहले ही दूसरा सवाल पूछने की इजाजत दे दी. मुलायम सिंह यादव उस समय कृषि मंत्री नीतीश कुमार से जवाब चाह रहे थे कि उत्तर प्रदेश में बाढ़ राहत के लिए क्या प्रयास किये जा रहे हैं. उस समय लोकसभा में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी, रामविलास पासवान जैसे नेता भी मौजूद थे.

22 दिसंबर 1999 को समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह यादव के इशारे पर देवेन्द्र सिंह यादव एवं अन्य सहयोगी सांसदों ने नीतीश कुमार के ऊपर हमला करने का प्रयास किया था क्यूंकि लोकसभा के सभापति ने नीतीश कुमार के जवाब देने से पहले ही दूसरा सवाल पूछने की इजाजत दे दी. मुलायम सिंह यादव उस समय कृषि मंत्री नीतीश कुमार से जवाब चाह रहे थे कि उत्तर प्रदेश में बाढ़ राहत के लिए क्या प्रयास किये जा रहे हैं. उस समय लोकसभा में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी, रामविलास पासवान जैसे नेता भी मौजूद थे.

8 अप्रैल 2000 के इस खबर में तीन गौर करने वाली बात है. १) एक तो यह कि मार्च 2000 में 8 दिन की सरकार गिरने के एक महीने के भीतर नीतीश कुमार को एक प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया था. २) नीतीश कुमार की गिरफ़्तारी कोई पहली गिरफ़्तारी नहीं थी लेकिन बतौर पूर्व-मुख्यमंत्री यह नीतीश कुमार की पहली गिरफ़्तारी थी. ३) तीसरी गौर करने वाली बात यह है कि बिहार में नीतीश कुमार की सरकार गिरने के बाद फिर से उन्हें रेल मंत्री बना दिया गया था लेकिन बिहार के अख़बारों में नीतीश कुमार को रेल मंत्री नहीं बल्कि पूर्व-मुख्यमंत्री लिखकर संबोधित किया जा रहा था, मानो बहुत जल्दी फिर से नीतीश कुमार की सरकार बन सकती है.

वर्ष 2012 में प्रतिष्ठित Foreign Policy पत्रिका ने सौ एलिट थिंकर मतलब प्रमुख प्रबुद्ध लोगों की सूचि जारी किया जिसमे नितीश कुमार को 77वां स्थान मिला जबकि RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को 80वां स्थान मिला था. नीतीश कुमार से ऊपर मात्र एक भारतीय थे सलमान रुश्दी लेकिन सलमान रुश्दी भी पुर्णतः भारतीय नहीं है क्यूंकि उनकी माँ पाकिस्तानी है, 1960 के दशक में वो भारत छोड़कर इंग्लैंड और अमेरिका की नागरिकता ले चुके हैं.

5 जुलाई 1997 को दिल्ली में लालू प्रसाद ने राष्ट्रीय जनता दल के स्थापना की घोषणा किये और 6 तारीख को पटना में वीरचंद पटेल मार्ग पर स्थित जनता दल के कार्यालय का बोर्ड बदल गया. बोर्ड में साफ़ साफ़ देख सकते हैं जिसमे राष्ट्रीय जनता दल हिंदी और उर्दू में लिखा हुआ है. जब दिल्ली में राष्ट्रीय जनता दल का गठन हो रहा था तब नीतीश कुमार कहाँ थे? क्या कर रहे थे? क्यूँ नीतीश कुमार का इस घटनाक्रम पर कोई भी बयान अख़बारों में नहीं दीखता है जबकि जॉर्ज फर्नांडिस का बयान बार बार दीखता है? आपके मत में राष्ट्रीय जनता दल के गठन पर नीतीश कुमार की चुप्पी का क्या कारण हो सकता है ?
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