Nitish Archive

आज कल हम जो बात किसी को आमने-सामने नहीं कह पाते हैं वो सोशल मीडिया पर बोल देते हैं, WhatsApp पर लिख भेजते हैं। लेकिन ये वर्ष १९९३ के शुरुआती महीने थे। नीतीश कुमार अभी लालू यादव और जनता दल के साथ थे, लेकिन नाराज़ थे। तो उन्होंने एक पत्र लिखा।

दार्शनिक मतभेद की शुरुआत

नीतीश जी ने लिखा:

“आपसे अब आगे बात करना मुमकिन नहीं है, क्यूँकि मुझे लगता है कि अब आप किसी ज़रूरी और महत्वपूर्ण मुद्दे पर बात करने को इच्छुक ही नहीं हैं। आपका पार्टी, सरकार या लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति व्यवहार और आपके आसपास रहने वाले लोगों की चौकड़ी कुछ इस तरह की हो गई है कि कुछ करने लायक़ किसी विषय के ऊपर कोई बात-चित करने का कोई जगह ही नहीं बचता है। इसीलिए मैं ये पत्र आपको लिख रहा हूँ।”

संघर्ष की विरासत और सत्ता का मोह

पत्र में नीतीश जी ने लालू यादव को उनके संघर्षपूर्ण अतीत और वर्तमान सत्ता के मोह के बीच के विरोधाभास को याद दिलाया:

“जनता दल और हमारी सरकार की इस सफलता के पीछे हज़ारों कार्यकर्ताओं और अनगिनत नेताओं का लम्बा संघर्ष है जिसने आपको सत्ता के शीर्ष पर बैठाया है। ये उसी संघर्ष का नतीजा है जिसे जे॰पी॰, कर्पूरी ठाकुर और रामानन्द तिवारी जैसे बड़े नेताओं ने नेतृत्व दिया था।”

“मैं हमेशा आपके पीछे चट्टान की तरह खड़ा रहा, जब आप नेता प्रतिपक्ष बन रहे थे तब भी और जब आप बिहार के मुख्यमंत्री बन रहे थे तब भी। मैं हमेशा आपकी सरकार की रक्षा के लिए खड़ा रहा और काम करता रहा। लेकिन इस सरकार ने हमारी सभी उम्मीदों और आशाओं को झकझोर दिया है, झुठला दिया है, और ये सरकार आपके इर्द-गिर्द सत्ता के चाटुकारों का खेल बनकर रह गया है।”

जातिवाद और श्रेय लेने की राजनीति

नीतीश जी ने सीधे तौर पर लालू यादव पर जातिवाद और सामूहिक प्रयासों का श्रेय अकेले लेने का आरोप लगाया:

“एक बात तो अब बिलकुल साफ़ हो गई है कि अब आपकी सरकार सारे ठेके और नौकरी एक ख़ास जाति के लोगों को दे रही है। पिछड़ों के भीतर ही इस तरह का भेदभाव अन्य पिछड़ी जातियों, ख़ासकर ग़ैर-यादव पिछड़ी जातियों के बीच एक रोष पैदा कर रही है।”

“जिस निर्णय को हमने साथ में लिया, जिन प्रयासों को हमने साथ में जिया, मैं देख सकता हूँ कि आप उन सबका श्रेय केवल स्वयं को दे रहे हैं। हम सबने मिलकर लाल कृष्ण आडवाणी को समस्तिपुर में गिरफ़्तार करने का निर्णय लिया, योजना बनाया लेकिन इस घटना का सारा क्रेडिट जिस तरह एक-छत्र रूप से आपने लिया उस तरह से हमने कभी नहीं लिया।”

“धर्म-निरपेक्षता की राजनीति कोई आपका पैदा किया हुआ मोरब्बा नहीं है, धर्म-निरपेक्षता की राजनीति को हम सबने जिया है लेकिन आपने उस धर्म-निरपेक्षता की राजनीति को हड़पने का प्रयास किया है, भोगने का प्रयास कर रहे हैं। ये तो स्वार्थ की राजनीति है।”

कांग्रेस के भ्रष्टाचार और कुशासन का दोहराव

नीतीश जी ने लालू सरकार पर कांग्रेस के ही भ्रष्टाचार और कुशासन को दोहराने का आरोप लगाया:

“जब हम आपकी सरकार बनाने के लिए दिन-रात एक कर रहे थे तब हमें विश्वास था कि आप कांग्रेस के भ्रष्टाचार और कुशासन को ख़त्म करने के लिए कुछ करेंगे, लेकिन अब ऐसा लगता है मानो आप सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने आप को हमेशा के लिए सत्ता में बनाए रखने के लिए सरकार चला रहे हैं, ऐसा लगता है जैसे आप सिर्फ़ अपने चंद यार दोस्तों को कुटिल कामों सहयोग करने के अलावा किसी अन्य काम में रुचि ही नहीं रखते हैं।”

“सरकारी ख़ज़ाने का जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है, पैसा का ज़बरदस्त हेरफेर हो रहा है, जिसके कारण सभी कल्याणकारी योजनाएँ दम तोड़ रही है, और शासन तो वो मानो कोमा में चला गया है।”

“पार्टी के सच्चे और कर्मठ कार्यकर्ता ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, नाराज़ हैं और अनाथ सा महसूस कर रहे हैं क्यूँकि आप उनकी बात सुनने को तैयार ही नहीं है। अब तो आपने अपने वरिष्ठ सहयोगियों का अपमान करना भी शुरू कर दिया है, आप सिर्फ़ चंद चाटुकारों से घिरे रहना चाहते हैं। आपको सत्ता दिलाने में सहयोग करते समय हमने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि आप ऐसा करेंगे।”

पत्र के पीछे की कहानी

यह पत्र नीतीश जी ने दिल्ली स्थित बिहार भवन में घटी उस घटना के कुछ महीनों बाद लिखा था जब १९९२ के अंतिम दिनों में नीतीश कुमार, ललन सिंह, शिवानंद तिवारी, बिशन पटेल, के साथ लालू जी का गाली-गलौज हुआ था।

पत्र की पृष्ठभूमि और भी अधिक रोचक है:

  • भाजपा नेता सरयू राय सोन नदी क्षेत्र और नालंदा में बढ़ते सूखे के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे किसानों की समस्या लेकर नीतीश कुमार के पास गए थे।
  • नीतीश कुमार तो कृषि राज्य मंत्री थे नहीं (१९८९ की जनता सरकार में नीतीश कुमार कृषि मंत्री देवी लाल के राज्य मंत्री थे) लेकिन सरजु राय को लगा कि चूंकि नीतीश कुमार मंत्री रह चुके थे तो कुछ तो पुराने लिंक से कुछ करवा ही सकते हैं।
  • दिल्ली में कांग्रेस की सरकार थी और भारतीय लोकतंत्र में वो रिवाज पनपने लगा था कि सत्ता बदलते ही सरकारी आवास से लेकर कार्यालय तक के नेम-प्लेट के रंग तक बदल ज़ाया करते थे। बेवफ़ा सनम और अल्ताफ़ राजा का ‘तुम तो ठहरे परदेशी’ बहुत जल्दी पूरे देश में धमाल मचाने वाली थी।
  • तो ऐसे माहौल में एक्स हो चुके कृषि राज्य मंत्री नीतीश कुमार क्या कर सकते थे?

लालू जी बिहार में सिंगल मैन आर्मी की तरह बहुजन की सरकार के नाम पर गर्दा उड़ाए हुए थे और रोज़ पॉप्युलैरिटी की नई ऊँचाई छू रहे थे। और नीतीश कुमार सांसद में एक धारधार वक्ता के रूप में उभर रहे थे और वक्ता भी ऐसे कि जिसके भाषण के सामने अटल भी असहज होकर तमतमाते हुए ग़ुस्से में सदन से बाहर चले जाते हों।

बिहार भवन की नाटकीय घटना

बहरहाल, नीतीश कुमार को पता था कि उनकी पैरवी न भाजपा के मार्फ़त हो सकती है, न जनता दल के मार्फ़त और न ही कांग्रेस के मार्फ़त। पता चला कि लालू जी भी दिल्ली आए हुए हैं और बिहार भवन में रुके हुए हैं। लालू जी अभी भी नीतीश कुमार के साथ सहज थे। शरद यादव भी उस तरह के पूल लालू की तारीफ़ों के नहीं बांध पा रहे थे, जिस तरह नीतीश कुमार संसद में बांध रहे थे। मिलने का समय माँगा गया और समय मिल भी गया।

सम्भवतः लालू यादव को पता नहीं था कि नीतीश जी के साथ ललन सिंह भी आ जाएँगे। सिर्फ़ ललन सिंह ही नहीं, बल्कि उनके साथ शिवानंद तिवारी और बिशन पटेल भी थे। सरजु राय और हेगड़े जी भी थे, लेकिन वो दोनों कमरे में दाखिल नहीं हुए। वो बिहार भवन के मुख्य द्वार पर लगे कुर्सी पर बैठे रहे।

एकाएक अंदर से चिल्लाने के आवाज़ आने लगी, कमरे से माँ-बहन की भद्दी भद्दी गालियाँ आ रही थी जिसमें ललन सिंह और लालू यादव की आवाज़ ही सुनाई पड़ रही थी। दावा करने वाले तो यहाँ तक दावा कर दिए कि कमरे के भीतर लालू जी और ललन सिंह के बीच मुक्केबाज़ी तक होने की नौबत आ गई।

लालू जी ललन सिंह को बोल रहे थे – “निकल बाहर, बाहर निकल, साल”

जब तक सरयू राय कुर्सी से उठकर लालू जी के कमरे के दरवाज़े तक पहुँचते, उन्होंने देखा कि लालू यादव अपने सुरक्षा-कर्मियों को बोल रहे थे – “पकड़ के फेंक तो बाहर, ले जाओ घसीट के।”

जब तक ललन सिंह को कोई सुरक्षा कर्मी हाथ लगाता, उसके पहले ही नीतीश कुमार ललन सिंह को दोनों हाथ से पकड़कर बिहार भवन से बाहर निकले, यह बड़बड़ाते हुए कि:

“अब साथ चल पाना मुश्किल है।”

पत्र का अंत और आगे का रास्ता

नीतीश कुमार ने सरयू राय से आग्रह किया कि वो उनके लिए एक सार्वजनिक पत्र लिखें जिसमें इस बात का ज़िक्र हो कि वो क्यूँ जनता दल और लालू यादव का साथ छोड़ रहे हैं। यह पत्र वो सार्वजनिक करना चाहते थे। यह जो पत्र हमने आपको वीडियो में पढ़कर सुनाया, यह वही पत्र है जिसका आख़री पन्ना आज तक नहीं मिल पाया है।

  • जब जनता दल के राष्ट्रिय अध्यक्ष शरद यादव जी को इस घटना के साथ साथ नीतीश जी के पत्र के बारे में पता चला तो लालू यादव को माफ़ी माँगने के निर्देश दिया। लालू यादव तैयार भी हो गए।
  • नीतीश जी को लालू जी से मिलवाने का प्रयास किया गया लेकिन नीतीश जी मिलने से साफ़ इनकार कर दिए।
  • शरद जी ने नीतीश जी से बोला – “अच्छा, कम से कम वो पत्र तो पढ़ने दो जो तुमने लालू के लिए लिखा है और सार्वजनिक करने वाले हो।”
  • नीतीश जी ने वो पत्र लिए, उस पत्र की भाषा को और अधिक आक्रामक और लालू जी के नीतियों पर प्रहार करता हुआ बनाया और शरद जी को दे दिया।

पता नहीं वो पत्र शरद जी ने कभी लालू यादव को पढ़वाया या नहीं लेकिन इस तीखे पत्र के बाद भी नीतीश कुमार को पूरे दो वर्ष लग गए अपनी अलग समता पार्टी बनाने में। जो जानते हैं नीतीश को वो ये जानते हैं कि नीतीश अपना हर कदम बहुत धीरे धीरे बढ़ाते हैं, फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं, लालू जी के ठीक विपरीत।

पत्र के उस आख़िरी पन्ने के बारे में शिवानंद तिवारी और सरयू राय दोनों ने बताया था कि आख़री पन्ने पर यह साफ़-साफ़ लिखा हुआ था कि:

“वह नीतीश अब किसी क़ीमत पर लालू के साथ कोई समझौता नहीं कर सकते हैं और वो अपना रास्ता अलग करने वाले हैं।”

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