नीतीश कुमार के मित्र अरुण सिन्हा की मानें तो नीतीश कुमार चुनावी राजनीति में बिल्कुल रुचि नहीं रखते थे। वो बदलाव की राजनीति से अधिक प्रभावित थे—वैचारिक राजनीति, नीतिगत राजनीति, पर्दे के पीछे वाली, मीडिया से दूर, रैली-भाषण सबके परे।
एक वैचारिक मोड़
लेकिन फिर एक दिन पत्नी मंजू ने कहा कि:
“जब चुनाव ही नहीं लड़ना है तो फिर ऐसी राजनीति का क्या मतलब?”
नीतीश कुमार को पत्नी की बात सही लगी। धीरे-धीरे मुख्यधारा के नेताओं की तरह नीतीश कुमार भी नेतागीरी करने लगे। लेकिन अभी तक नीतीश JP की नज़र में नहीं आए थे।
पिता का आशीर्वाद और JP से मुलाक़ात
इसी दौरान नीतीश जी के पिताजी एक दिन JP से मिलने पटना आए। चूँकि नीतीश जी के पिताजी स्वतंत्रता संग्राम में रह चुके थे और दो बार कांग्रेस से बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने का असफल प्रयास कर चुके थे, इसलिए JP उन्हें थोड़ा बहुत पहचानते थे।
पिताजी ने JP से मिलकर उन्हें बताया कि कैसे कांग्रेस ने आज़ादी के मक़सद को धोखा दिया है। उन्होंने JP को यह भी बताया:
“अब मैं तो आपके आंदोलन में सक्रिय नहीं हूँ, लेकिन मेरा बेटा नीतीश सक्रिय है। वह आपका प्रशंसक भी है और आपकी तरह सिद्धांतवादी है। मैं उसी के लिए आपके पास आशीर्वाद लेने आया हूँ।”
लेकिन JP नीतीश को अभी तक नहीं पहचानते थे। वह लालू को ज़रूर पहचानते थे, सुशील मोदी को भी पहचानते थे, लेकिन नीतीश को नहीं।
आंदोलन की मशाल और नेतृत्व का उदय
इसी दौरान JP ने पूरे बिहार के छात्रों को एक वर्ष तक क्लास छोड़ने और आंदोलन को मज़बूत करने का आग्रह किया। कुछ हफ़्ते तो ठीक लगा, लेकिन फिर छात्र वापस क्लासरूम में जाने लगे।
ऐसे में उभरे नीतीश। नीतीश कुमार एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज गए और छात्रों को क्लास का बहिष्कार करने का आग्रह किया। नीतीश जी के जीवन में यह पहली बार था जब वो:
- छात्रों की सभाओं को सम्बोधित कर रहे थे।
- कॉलेज प्रशासन से लड़ रहे थे।
- VC का घेराव कर रहे थे।
VC से टकराव और JP की नज़र
उस समय पटना यूनिवर्सिटी के VC थे देवेंद्र नाथ शर्मा। VC के साथ एक लम्बी बकझक और उस बकझक में नीतीश द्वारा VC के ख़िलाफ़ छात्रों की एक भीड़ जमा करना और उस भीड़ को अंत तक बनाए रखना—यह काफ़ी था कि JP नीतीश जी को नोटिस करें।
यह पहली बार था जब JP ने नीतीश जी की तारीफ़ की थी। उस घटना के बाद JP नीतीश जी को नाम से पहचानते भी थे और पुकारते भी थे।
एक चर्चित चेहरा
अब नीतीश जी एक चर्चित चेहरा थे। वह अलग-अलग ज़िलों में जाते थे और सभाओं को सम्बोधित करते थे। नीतीश जी की JP से बढ़ती करीबी ने लालू यादव को कभी नहीं डराया, क्यूँकि अभी भी लालू यादव नीतीश कुमार से कोसों आगे थे।