Nitish Archive

जब देश में आपातकाल लगा हुआ था, उसी दौरान नीतीश कुमार और लालू यादव का नाम बिहार के दो सबसे बड़े छात्र नेताओं के रूप में गिना जाता था। दोनों का लोकसभा चुनाव लड़ना बिल्कुल तय था। लालू यादव तो चुनाव लड़े, लेकिन नीतीश कुमार नहीं। आखिर क्यों?

जेल की चारदीवारी और ‘लेट-लतीफी’ का खेल

नीतीश कुमार के चुनाव न लड़ पाने का सबसे बड़ा कारण यह था कि वह समय पर जेल से बाहर ही नहीं आ पाए। जब आपातकाल खत्म हुआ और नए चुनावों की घोषणा हुई, तो सभी आंदोलनकारी एक-एक करके बाहर आ रहे थे।

लेकिन नीतीश जी के साथ क्या हुआ?

  • जिस समय उन्हें रिहा होना चाहिए था, उसी दौरान उनका जेल बदल दिया गया।
  • उन्हें बक्सर जेल से भागलपुर जेल शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।
  • इस प्रशासनिक प्रक्रिया और जेल बदलने की ‘लेट-लतीफी’ के कारण उनकी रिहाई में भारी विलम्ब हो गया।

इस सफर में एक रोचक मोड़ तब आया जब बक्सर से पटना होते हुए उन्हें भागलपुर ले जाया जा रहा था। पटना पहुँचते ही शाम की आखिरी ट्रेन छूट गई। नीतीश जी के आग्रह पर पुलिस वाले उनके ससुराल (कंकड़बाग) में रुकने को तैयार हो गए। वहाँ रात बिताने के कारण भी प्रक्रिया में कुछ घंटों का और विलम्ब हुआ।

चुनावी तिकड़म और आर्थिक मजबूरी

सवाल यह भी उठता है कि लोग तो जेल से भी चुनाव लड़ते हैं; जॉर्ज फर्नांडिस साहब जेल में रहते हुए मुज़फ़्फ़रपुर से चुनाव लड़ रहे थे। तो नीतीश जी को टिकट क्यों नहीं मिला?

इसके पीछे कुछ कड़वी राजनीतिक सच्चाईयाँ थीं:

  1. चुनावी तिकड़म: स्थानीय नेताओं को लगता था कि नीतीश जी चुनावी जोड़-तोड़ और तिकड़म नहीं कर सकते।
  2. आर्थिक मदद: आंदोलन चलाने के लिए धन की आवश्यकता थी। टिकट श्याम सुंदर गुप्ता जी को दे दिया गया, जो कलकत्ता से थे और उन्होंने आंदोलन में बड़ी आर्थिक मदद की थी।

अपनों की कसक और नेताओं की मंशा

पत्नी मंजू जी को हमेशा यह लगता रहा कि अगर मित्र नरेंद्र सिंह थोड़ा और प्रयास करते, जेल IG से मिन्नतें करते, तो नीतीश जी १९७७ में ही सांसद बन चुके होते।

वहीं, नरेंद्र सिंह का मानना है कि अगर जनता पार्टी के बड़े नेताओं को टिकट देना होता, तो वे दे देते और नीतीश जी बेल पर बाहर आ जाते। पर शायद गुप्ता जी से ली गई आर्थिक मदद और चुनावी खर्च की मजबूरी के कारण पार्टी उन्हें टिकट देना ही नहीं चाहती थी।

वैचारिक द्वंद्व: सत्ता या संघर्ष?

नीतीश जी स्वयं भी एक अंतर्द्वंद्व में थे। वह ‘कन्फ्यूज्ड’ थे कि:

  • क्या उन्हें चुनावी राजनीति में जाना चाहिए?
  • या फिर JP के साथ रहकर बिना किसी पद की लालसा के सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करना चाहिए?

मोरारजी देसाई की सरकार का जो हश्र हो रहा था, वह उन्हें JP की विचारधारा की ओर खींचता था, जबकि पत्नी, परिवार और उनकी अपनी राजनीतिक आकांक्षाएँ उन्हें चुनाव की ओर ढकेल रही थीं। इसी कशमकश के बीच चुनाव की घोषणा हुई और अंततः नीतीश कुमार ने चुनावी राजनीति के पथ पर चलने का कठिन फैसला किया।

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