१९७७ के लोकसभा चुनाव में टिकट नहीं मिल पाने के बाद नीतीश कुमार ने १९७७ का बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया। पूरे बिहार के दो सर्वाधिक शीर्ष युवा छात्र नेताओं में से एक नीतीश कुमार (पहले लालू यादव थे) कैसे अपना पहला चुनाव हार गए? यह किसी को भी आश्चर्यचकित कर सकता है। लेकिन जब घटनाओं को सिलसिलेवार ढंग से याद करते हैं, तो सब साफ़ हो जाता है।
बेलची नरसंहार: एक वैचारिक अग्निपरीक्षा
२७ मई को, जिस हर्नौत विधानसभा क्षेत्र से नीतीश कुमार चुनाव लड़ रहे थे, वहाँ से मात्र ७ किमी दूर बेलची गाँव में एक भयावह नरसंहार हुआ। इसमें कुर्मी जाति के ज़मींदारों ने पासवान जाति के ७ और सोनार जाति के ४ लोगों की हत्या कर दी।
- स्थानीय मीडिया का पक्ष: इसे सिंघेश्वर पासवान (सिंघवा गैंग) और महावीर सिंह (कुर्मी गैंग) के बीच ‘गैंगवार’ के रूप में देखा गया।
- दबंग जातियों का पक्ष: इसे ‘सिंघवा आतंक’ के खात्मे की तरह देखा गया।
- नीतीश कुमार का पक्ष: एक समाजवादी होने के नाते उन्होंने अपनी ही जाति (कुर्मी) का साथ न देकर पासवानों का पक्ष लिया और नरसंहार की कड़ी आलोचना की।
नीतीश कुमार उसी दिन चुनाव हार गए थे जिस दिन उन्होंने अपने ही जाति के दबंगों का विरोध किया था।
अभिमन्यु की तरह घेराबंदी: चुनावी गणित
कुर्मी जाति के ज़मींदार नीतीश कुमार को हराने के लिए एकजुट हो गए। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर भोला प्रसाद सिंह को मैदान में उतारा।
विडंबना: ये वही भोला सिंह थे, जिनकी फिएट गाड़ी में नीतीश कुमार और मंजू देवी शादी के बाद पटना से बख़्तियारपुर आए थे। जिस समाज ने कभी दहेज-विहीन विवाह के लिए नीतीश को अपना नायक माना था, वही समाज अब उन्हें हराने पर उतारू था। नारा लगा: “बम चले या गोला, जीतेगा तो भोला।”
वोटों का बँटवारा:
नीतीश कुमार के वोट बैंक को काटने के लिए रणनीतिक तौर पर अन्य उम्मीदवारों को खड़ा किया गया:
| उम्मीदवार | पार्टी/स्थिति | प्राप्त वोट |
| भोला प्रसाद सिंह | निर्दलीय (कुर्मी गैंग समर्थित) | २८,२२८ (विजेता) |
| नीतीश कुमार | जनता पार्टी | २२,३३३ |
| देवनंदन सिंह यादव | निर्दलीय (यादव वोट काटने हेतु) | १०,०६१ |
| दिनेश प्रसाद सिंह | कांग्रेस (कुशवाहा वोट हेतु) | ७,०५९ |
नीतीश कुमार ५,८९५ वोटों से चुनाव हार गए। उन्हें अपनों ने ही घेरकर शिकस्त दी थी।
इंदिरा गाँधी का बेलची आगमन और राष्ट्रीय प्रभाव
नीतीश कुमार की इस हार का असर दिल्ली तक हुआ। इसी बीच, बेलची नरसंहार एक राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका था।
- २४ जून को कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री बने।
- १३ अगस्त १९७७ (स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या) को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी बेलची पहुँच गईं।
इंदिरा गाँधी के वहाँ पहुँचते ही पूरा माहौल बदल गया। देश की आजादी के बाद पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार को बेलची के बहाने कांग्रेस ने ज़ोरदार तरीके से घेर लिया। यह घटना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बनी। नीतीश कुमार की हार केवल एक सीट की हार नहीं थी, बल्कि एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक मंथन का परिणाम थी।