१९९४ की कुर्मी रैली के बारे में लोगों में एक बड़ा भ्रम है। अक्सर कहा जाता है कि उस रैली में जब नीतीश कुमार, लालू यादव के पक्ष में कुछ बोलने लगे तो लोगों ने जूता-चप्पल फेंकना शुरू कर दिया था।
वास्तविकता: मधु सिंह और जूता-चप्पल कांड
असल में, जूता-चप्पल तब चला था जब पलामू में पांकी के निर्दलीय विधायक मधु सिंह लालू यादव के समर्थन में कुछ बोलने लगे थे। बात सिर्फ जूता-चप्पल तक सीमित नहीं रही:
- अगले साल के चुनाव में मधु सिंह ने लालू यादव की पार्टी (जनता दल) के टिकट पर चुनाव लड़ा और उन्हें १० हज़ार से अधिक वोटों से हारना पड़ा।
- वर्ष २००० में मधु सिंह को जीत तब मिली जब उन्होंने लालू यादव का साथ छोड़कर नीतीश कुमार की पार्टी का दामन थामा। वह झारखंड में रहते हुए भी लगातार नीतीश कुमार और JDU के साथ जुड़े रहे।
रैलियों का दौर और लालू यादव की रणनीति
१९९४ का साल रैलियों का साल था क्योंकि १९९५ में चुनाव होने थे। हर जाति अपनी एकजुटता दिखा रही थी:
- ३० जनवरी: दलितों की रैली हुई (लगभग २ लाख की भीड़), जिसमें लालू यादव मुख्य अतिथि थे।
- कुशवाहा रैली: इसकी एकजुटता तोड़ने के लिए लालू यादव ने कुशवाहा के कुछ नेताओं को लेकर एक समानांतर रैली करवा दी और खुद उसमें मुख्य अतिथि बनकर गए।
- २८ फ़रवरी: राँची में कांग्रेस (ई) के कुर्मी महासम्मेलन की सफलता के बाद पटना गांधी मैदान की ऐतिहासिक रैली हुई।
कुर्मी रैली को भी तोड़ने का पूरा प्रयास किया गया था, लेकिन समाज में आक्रोश इतना था कि कोई हिम्मत नहीं कर सका। जिसने प्रयास किया, उसे जनता का विरोध (जूता) सहना पड़ा और चुनाव में हार मिली।
आँकड़ों का भ्रम: १९९४ बनाम २०२३
आज की तरह १९९४ में भी जातियों के आँकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए थे। उस दौर के अखबारों और पत्रिकाओं के दावों और आज की वास्तविकता में बड़ा अंतर है:
| विवरण | १९९४ का दावा | २०२३ की जनगणना |
| कुर्मी आबादी (स्वतंत्र) | ४.५% | २.८१% |
| कुर्मी + सभी उपजातियाँ | १४.०५% | – |
| यादव आबादी (तुलना हेतु) | १४.१०% | १४.२६% |
विधायकों की संख्या का अफ़वाह:
१९९४ की रैली में यह अफ़वाह भी खूब उड़ी कि वर्ष १९५० में बिहार में ४६ कुर्मी विधायक हुआ करते थे, जो १९९० में घटकर मात्र १४ रह गए।
हकीकत यह है कि वर्ष २०१५ में १६ कुर्मी विधायक थे और २०२० के चुनाव में यह संख्या घटकर मात्र १० रह गई है।