यह कहानी उस दौर की है जब पटना यूनिवर्सिटी का कैंपस क्रांति का केंद्र था। एक बार पुलिस यूनिवर्सिटी के प्रमुख छात्र नेताओं को गिरफ़्तार करने के लिए कैंपस आयी।
हिट-लिस्ट और पुलिस का छापा
पुलिस के पास उन छात्रों की एक पूरी सूची थी जिन्हें गिरफ़्तार करना था। उस ‘हिट-लिस्ट’ में उस समय के सभी चर्चित नाम शामिल थे:
- लालू यादव
- शिवानंद तिवारी
- सुशील मोदी
- नरेंद्र सिंह
- नीतीश कुमार
एक ही जगह, अलग-अलग तक़दीर
छापेमारी के दौरान पुलिस को एक ही जगह पर नीतीश कुमार, सुशील मोदी, नरेंद्र सिंह और शिवानंद तिवारी मिल गए। पुलिस ने वहाँ मौजूद लगभग सबको गिरफ़्तार कर लिया, लेकिन नीतीश कुमार को गिरफ़्तार नहीं किया।
पहचान का संकट या रणनीति?
नीतीश कुमार के बच निकलने की वजह कोई फिल्मी भाग-दौड़ नहीं थी, बल्कि उनकी गुमनामी थी। पुलिस ने उन्हें इसलिए नहीं पकड़ा क्योंकि:
- वो नीतीश कुमार को पहचानते ही नहीं थे।
- नीतीश जी उस समय किसी जनसभा के मंच पर नज़र नहीं आते थे।
- अखबारों में उनका किसी तरह का कोई बयान नहीं छपता था।
उस समय नीतीश कुमार ‘पर्दे के पीछे’ रहकर रणनीति बनाने वाले कार्यकर्ता थे। यहाँ तक कि JP (जयप्रकाश नारायण) भी उन्हें तब तक नहीं जानते थे, जब तक नीतीश कुमार ने यूनिवर्सिटी में ऐतिहासिक बस आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया।